| 1 | हे यहोवा, हे बदला लेनेवाले परमेश्वर, हे बदला लेनेवाले परमेश्वर, अपना तेज दिखा! |
| 2 | हे पृथ्वी के न्यायी, उठ; और घमण्डियों को बदला दे! |
| 3 | हे यहोवा, दुष्ट लोग कब तक, दुष्ट लोग कब तक डींग मारते रहेंगे? |
| 4 | वे बकते और ढिठाई की बातें बोलते हैं, सब अनर्थकारी बड़ाई मारते हैं। |
| 5 | हे यहोवा, वे तेरी प्रजा को पीस डालते हैं, वे तेरे निज भाग को दु:ख देते हैं। |
| 6 | वे विधवा और परदेशी का घात करते, और अनाथों को मार डालते हैं; |
| 7 | और कहते हैं, “याह न देखेगा, याकूब का परमेश्वर विचार न करेगा।” |
| 8 | तुम जो प्रजा में पशु सरीखे हो, विचार करो; और हे मूर्खो, तुम कब बुद्धिमान बनोगे? |
| 9 | जिसने कान दिया, क्या वह आप नहीं सुनता? जिसने आँख रची, क्या वह आप नहीं देखता? |
| 10 | जो जाति जाति को ताड़ना देता, और मनुष्य को ज्ञान सिखाता है, क्या वह न समझाएगा? |
| 11 | यहोवा मनुष्य की कल्पनाओं को जानता है कि वे मिथ्या हैं। |
| 12 | हे याह, क्या ही धन्य है वह पुरुष जिसको तू ताड़ना देता है, और अपनी व्यवस्था सिखाता है। |
| 13 | क्योंकि तू उसको विपत्ति के दिनों में उस समय तक चैन देता रहता है, जब तक दुष्टों के लिये गड़हा नहीं खोदा जाता। |
| 14 | क्योंकि यहोवा अपनी प्रजा को न तजेगा, वह अपने निज भाग को न छोड़ेगा; |
| 15 | परन्तु न्याय फिर धर्म के अनुसार किया जाएगा, और सारे सीधे मनवाले उसके पीछे पीछे हो लेंगे। |
| 16 | कुकर्मियों के विरुद्ध मेरी ओर कौन खड़ा होगा? मेरी ओर से अनर्थकारियों का कौन सामना करेगा? |
| 17 | यदि यहोवा मेरा सहायक न होता, तो क्षण भर में मुझे चुपचाप होकर रहना पड़ता। |
| 18 | जब मैं ने कहा, “मेरा पाँव फिसलने लगा है,” तब हे यहोवा, तेरी करुणा ने मुझे थाम लिया। |
| 19 | जब मेरे मन में बहुत सी चिन्ताएँ होती हैं, तब हे यहोवा, तेरी दी हुई शान्ति से मुझ को सुख होता है। |
| 20 | क्या तेरे और दुष्टों के सिंहासन के बीच सन्धि होगी, जो कानून की आड़ में उत्पात मचाते हैं? |
| 21 | वे धर्मी का प्राण लेने को दल बाँधते हैं, और निर्दोष को प्राणदण्ड देते हैं। |
| 22 | परन्तु यहोवा मेरा गढ़, और मेरा परमेश्वर मेरी शरण की चट्टान ठहरा है। |
| 23 | उसने उनका अनर्थ काम उन्हीं पर लौटाया है, और वह उन्हें उन्हीं की बुराई के द्वारा नष्ट करेगा। हमारा परमेश्वर यहोवा उनका सत्यानाश करेगा। |