| 1 | मुझ प्राचीन की ओर से प्रिय गयुस के नाम, जिससे मैं सच्चा प्रेम रखता हूँ। |
| 2 | हे प्रिय, मेरी यह प्रार्थना है कि जैसे तू आत्मिक उन्नति कर रहा है, वैसे ही तू सब बातों में उन्नति करे और भला चंगा रहे। |
| 3 | क्योंकि जब भाइयों ने आकर तेरे उस सत्य की गवाही दी, जिस पर तू सचमुच चलता है, तो मैं बहुत ही आनन्दित हुआ। |
| 4 | मुझे इससे बढ़कर और कोई आनन्द नहीं कि मैं सुनूँ, कि मेरे बच्चे सत्य पर चलते हैं। |
| 5 | हे प्रिय, जो कुछ तू उन भाइयों के साथ करता है, जो परदेशी हैं, उसे विश्वासी के रूप में करता है। |
| 6 | उन्होंने कलीसिया के सामने तेरे प्रेम की गवाही दी है। यदि तू उन्हें उस प्रकार विदा करेगा जिस प्रकार परमेश्वर के लोगों के लिये उचित है तो अच्छा करेगा। |
| 7 | क्योंकि वे उस नाम के लिये निकले हैं, और अन्यजातियों से कुछ नहीं लेते। |
| 8 | इसलिये ऐसों का स्वागत करना चाहिए, जिससे हम भी सत्य के पक्ष में उनके सहकर्मी हों। |
| 9 | मैं ने कलीसिया को कुछ लिखा था, पर दियुत्रिफेस जो उनमें बड़ा बनना चाहता है, हमें ग्रहण नहीं करता। |
| 10 | इसलिये जब मैं आऊँगा तो उसके कामों की जो वह कर रहा है, सुधि दिलाऊँगा, कि वह हमारे विषय में बुरी-बुरी बातें बकता है; और इस पर भी सन्तोष न करके आप ही भाइयों को ग्रहण नहीं करता, और उन्हें जो ग्रहण करना चाहते हैं मना करता है और कलीसिया से निकाल देता है। |
| 11 | हे प्रिय, बुराई के नहीं पर भलाई के अनुयायी हो। जो भलाई करता है, वह परमेश्वर की ओर से है; पर जो बुराई करता है, उसने परमेश्वर को नहीं देखा। |
| 12 | दिमेत्रियुस के विषय में सब ने, वरन् सत्य ने भी आप ही गवाही दी; और हम भी गवाही देते हैं, और तू जानता है कि हमारी गवाही सच्ची है। |
| 13 | मुझे तुझ को बहुत कुछ लिखना तो था, पर स्याही और कलम से लिखना नहीं चाहता। |
| 14 | पर मुझे आशा है कि तुझ से शीघ्र भेंट करूँगा, तब हम आमने-सामने बातचीत करेंगे। |
| 15 | तुझे शान्ति मिलती रहे। यहाँ के मित्र तुझे नमस्कार कहते हैं। वहाँ के मित्रों से नाम ले लेकर नमस्कार कह देना। |