| 1 | प्रधान बजानेवाले के लिये: यदूतून की राग पर, आसाप का भजन। मैं परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दूँगा, मैं परमेश्वर की दोहाई दूँगा, और वह मेरी ओर कान लगाएगा। |
| 2 | संकट के दिन मैं प्रभु की खोज में लगा रहा; रात को मेरा हाथ फैला रहा, और ढीला न हुआ, मुझ में शान्ति आई ही नहीं। |
| 3 | मैं परमेश्वर का स्मरण कर करके कराहता हूँ; मैं चिन्ता करते करते मूर्च्छित हो चला हूँ। (सेला) |
| 4 | तू मुझे झपकी लगने नहीं देता; मैं ऐसा घबराया हूँ कि मेरे मुँह से बात नहीं निकलती। |
| 5 | मैं ने प्राचीनकाल के दिनों को, और युग युग के वर्षों को सोचा है। |
| 6 | मैं रात के समय अपने गीत को स्मरण करता; और मन में ध्यान करता हूँ, और मन में भली भाँति विचार करता हूँ: |
| 7 | “क्या प्रभु युग युग के लिये छोड़ देगा; और फिर कभी प्रसन्न न होगा? |
| 8 | क्या उसकी करुणा सदा के लिये जाती रही? क्या उसका वचन पीढ़ी पीढ़ी के लिये निष्फल हो गया है? |
| 9 | क्या परमेश्वर अनुग्रह करना भूल गया? क्या उसने क्रोध करके अपनी सब दया को रोक रखा है?” (सेला) |
| 10 | मैं ने कहा, “यही तो मेरा दु:ख है, कि परमप्रधान का दाहिना हाथ बदल गया है।” |
| 11 | मैं याह के बड़े कामों की चर्चा करूँगा; निश्चय मैं तेरे प्राचीनकालवाले अद्भुत कामों का स्मरण करूँगा। |
| 12 | मैं तेरे सब कामों पर ध्यान करूँगा, और तेरे बड़े कामों को सोचूँगा। |
| 13 | हे परमेश्वर तेरी गति पवित्रता की है। कौन सा देवता परमेश्वर के तुल्य बड़ा है? |
| 14 | अद्भुत काम करनेवाला परमेश्वर तू ही है, तू ने देश देश के लोगों पर अपनी शक्ति प्रगट की है। |
| 15 | तू ने अपने भुजबल से अपनी प्रजा, याकूब और यूसुफ के वंश को छुड़ा लिया है। (सेला) |
| 16 | हे परमेश्वर, समुद्र ने तुझे देखा, समुद्र तुझे देखकर डर गया, गहिरा सागर भी काँप उठा। |
| 17 | मेघों से बड़ी वर्षा हुई; आकाश से शब्द हुआ; फिर तेरे तीर इधर उधर चले। |
| 18 | बवण्डर में तेरे गरजने का शब्द सुन पड़ा था; जगत बिजली से प्रकाशित हुआ; पृथ्वी काँपी और हिल गई। |
| 19 | तेरा मार्ग समुद्र में है, और तेरा रास्ता गहिरे जल में हुआ; और तेरे पाँवों के चिह्न मालूम नहीं होते। |
| 20 | तू ने मूसा और हारून के द्वारा अपनी प्रजा की अगुवाई भेड़ों की सी की। |