| 1 | प्रधान बजानेवाले के लिये दाऊद का भजन हे परमेश्वर, तू जिसकी मैं स्तुति करता हूँ, चुप न रह! |
| 2 | क्योंकि दुष्ट और कपटी मनुष्यों ने मेरे विरुद्ध मुँह खोला है, वे मेरे विषय में झूठ बोलते हैं। |
| 3 | उन्होंने बैर के वचनों से मुझे चारों ओर घेर लिया है, और व्यर्थ मुझ से लड़ते हैं। |
| 4 | मेरे प्रेम के बदले में वे मेरा विरोध करते हैं, परन्तु मैं तो प्रार्थना में लवलीन रहता हूँ। |
| 5 | उन्होंने भलाई के बदले में मुझ से बुराई की और मेरे प्रेम के बदले मुझ से बैर किया है। |
| 6 | तू उसको किसी दुष्ट के अधिकार में रख, और कोई विरोधी उसकी दाहिनी ओर खड़ा रहे। |
| 7 | जब उसका न्याय किया जाए, तब वह दोषी निकले, और उसकी प्रार्थना पाप गिनी जाए! |
| 8 | उसके दिन थोड़े हों, और उसके पद को दूसरा ले! |
| 9 | उसके बच्चे अनाथ हो जाएँ, और उसकी स्त्री विधवा हो जाए! |
| 10 | और उसके लड़के मारे मारे फिरें, और भीख माँगा करें; उनको अपने उजड़े हुए घर से दूर जाकर टुकड़े माँगना पड़े! |
| 11 | महाजन फन्दा लगाकर, उसका सर्वस्व ले ले; और परदेशी उसकी कमाई को लूट लें! |
| 12 | कोई न हो जो उस पर करुणा करता रहे, और उसके अनाथ बालकों पर कोई अनुग्रह न करे! |
| 13 | उसके वंश का नाश हो जाए, दूसरी पीढ़ी में उसका नाम मिट जाए! |
| 14 | उसके पितरों का अधर्म यहोवा को स्मरण रहे, और उसकी माता का पाप न मिटे! |
| 15 | वह निरन्तर यहोवा के सम्मुख रहे, कि वह उनका नाम पृथ्वी पर से मिटा डाले! |
| 16 | क्योंकि वह दुष्ट, कृपा करना भूल गया वरन् दीन और दरिद्र को सताता था और मार डालने की इच्छा से खेदित मनवालों के पीछे पड़ा रहता था। |
| 17 | वह शाप देने से प्रीति रखता था, और शाप उस पर आ पड़ा; वह आशीर्वाद देने से प्रसन्न न होता था, इसलिये आशीर्वाद उस से दूर रहा। |
| 18 | वह शाप देना वस्त्र के समान पहिनता था, और वह उसके पेट में जल के समान, और उसकी हड्डियों में तेल के समान समा गया। |
| 19 | वह उसके लिये ओढ़ने का काम दे, और फेंटे के समान उसकी कटि में नित्य कसा रहे। |
| 20 | यहोवा की ओर से मेरे विरोधियों को, और मेरे विरुद्ध बुरा कहनेवालों को यही बदला मिले! |
| 21 | परन्तु मुझ से हे यहोवा प्रभु, तू अपने नाम के निमित्त बर्ताव कर; तेरी करुणा तो बड़ी है, इसलिये तू मुझे छुटकारा दे! |
| 22 | क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूँ, और मेरा हृदय घायल हुआ है। |
| 23 | मैं ढलती हुई छाया के समान जाता रहा हूँ; मैं टिड्डी के समान उड़ा दिया गया हूँ। |
| 24 | उपवास करते करते मेरे घुटने निर्बल हो गए; और मुझ में चर्बी न रहने से मैं सूख गया हूँ। |
| 25 | मेरी तो उन लोगों में नामधराई होती है; जब वे मुझे देखते, तब सिर हिलाते हैं। |
| 26 | हे मेरे परमेश्वर यहोवा, मेरी सहायता कर! अपनी करुणा के अनुसार मेरा उद्धार कर! |
| 27 | जिस से वे जानें कि यह तेरा काम है, और हे यहोवा, तू ही ने यह किया है! |
| 28 | वे कोसते तो रहें, परन्तु तू आशीष दे! वे तो उठते ही लज्जित हों, परन्तु तेरा दास आनन्दित हो! |
| 29 | मेरे विरोधियों को अनादररूपी वस्त्र पहिनाया जाए, और वे अपनी लज्जा को कम्बल के समान ओढ़ें! |
| 30 | मैं यहोवा का बहुत धन्यवाद करूँगा, और बहुत से लोगों के बीच में उसकी स्तुति करूँगा। |
| 31 | क्योंकि वह दरिद्र की दाहिनी ओर खड़ा रहेगा, कि उसको प्राण–दण्ड दिलानेवालों से बचाए। |