| 1 | दाऊद का भजन धन्य है यहोवा, जो मेरी चट्टान है, वह मेरे हाथों को लड़ने, और युद्ध करने के लिये तैयार करता है। |
| 2 | वह मेरे लिये करुणानिधान और गढ़, ऊँचा स्थान और छुड़ानेवाला है, वह मेरी ढाल और शरणस्थान है, जो मेरी प्रजा को मेरे वश में कर देता है। |
| 3 | हे यहोवा, मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है, या आदमी क्या है कि तू उसकी कुछ चिन्ता करता है? |
| 4 | मनुष्य तो साँस के समान है; उसके दिन ढलती हुई छाया के समान हैं। |
| 5 | हे यहोवा, अपने स्वर्ग को नीचा करके उतर आ! पहाड़ों को छू, तब उनसे धुआँ उठेगा! |
| 6 | बिजली कड़काकर उनको तितर बितर कर दे, अपने तीर चलाकर उनको घबरा दे! |
| 7 | अपने हाथ ऊपर से बढ़ाकर मुझे महासागर से उबार, अर्थात् परदेशियों के वश से छुड़ा। |
| 8 | उनके मुँह से तो व्यर्थ बातें निकलती हैं, और उनके दाहिने हाथ से धोखे के काम होते हैं। |
| 9 | हे परमेश्वर, मैं तेरी स्तुति का नया गीत गाऊँगा; मैं दस तारवाली सारंगी बजाकर तेरा भजन गाऊँगा। |
| 10 | तू राजाओं का उद्धार करता है, और अपने दास दाऊद को तलवार की मार से बचाता है। |
| 11 | तू मुझ को उबार और परदेशियों के वश से छुड़ा ले, जिन के मुँह से व्यर्थ बातें निकलती हैं, और जिनका दाहिना हाथ झूठ का दाहिना हाथ है। |
| 12 | जब हमारे बेटे जवानी के समय पौधों के समान बढ़े हुए हों, और हमारी बेटियाँ उन कोनेवाले खम्भों के समान हों, जो महल के लिए बनाए जाएँ; |
| 13 | जब हमारे खत्ते भरे रहें, और उन में भाँति भाँति का अन्न रखा जाए, और हमारी भेड़-बकरियाँ हमारे मैदानों में हज़ारों हज़ार बच्चे जनें; |
| 14 | जब हमारे बैल खूब लदे हुए हों; जब हमें न विघ्न हो और न हमारा कहीं जाना हो, और न हमारे चौकों में रोना-पीटना हो, |
| 15 | तो इस दशा में जो राज्य हो वह क्या ही धन्य होगा! जिस राज्य का परमेश्वर यहोवा है, वह क्या ही धन्य है! |