| 1 | याह की स्तुति करो। क्योंकि अपने परमेश्वर का भजन गाना अच्छा है; क्योंकि वह मनभावना है, उसकी स्तुति करनी मनभावनी है। |
| 2 | यहोवा यरूशलेम को बसा रहा है; वह निकाले हुए इस्राएलियों को इकट्ठा कर रहा है। |
| 3 | वह खेदित मनवालों को चंगा करता है, और उनके शोक पर मरहम-पट्टी बाँधता है। |
| 4 | वह तारों को गिनता, और उन में से एक एक का नाम रखता है। |
| 5 | हमारा प्रभु महान् और अति सामर्थी है; उसकी बुद्धि अपरम्पार है। |
| 6 | यहोवा नम्र लोगों को सम्भालता है, और दुष्टों को भूमि पर गिरा देता है। |
| 7 | धन्यवाद करते हुए यहोवा का गीत गाओ; वीणा बजाते हुए हमारे परमेश्वर का भजन गाओ। |
| 8 | वह आकाश को मेघों से छा देता है, और पृथ्वी के लिये मेंह की तैयारी करता है, और पहाड़ों पर घास उगाता है। |
| 9 | वह पशुओं को और कौवे के बच्चों को जो पुकारते हैं, आहार देता है। |
| 10 | न तो वह घोड़े के बल को चाहता है, और न पुरुष के पैरों से प्रसन्न होता है; |
| 11 | यहोवा अपने डरवैयों ही से प्रसन्न होता है, अर्थात् उन से जो उसकी करुणा की आशा लगाए रहते हैं। |
| 12 | हे यरूशलेम, यहोवा की प्रशंसा कर! हे सिय्योन, अपने परमेश्वर की स्तुति कर! |
| 13 | क्योंकि उसने तेरे फाटकों के खम्भों को दृढ़ किया है, और तेरे लड़कों को आशीष दी है। |
| 14 | वह तेरी सीमा में शान्ति देता है, और तुझ को उत्तम से उत्तम गेहूँ से तृप्त करता है। |
| 15 | वह पृथ्वी पर अपनी आज्ञा का प्रचार करता है, उसका वचन अति वेग से दौड़ता है। |
| 16 | वह ऊन के समान हिम को गिराता है, और राख के समान पाला बिखेरता है। |
| 17 | वह बर्फ के टुकड़े गिराता है, उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है? |
| 18 | वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है; वह वायु बहाता है, तब जल बहने लगता है। |
| 19 | वह याकूब को अपना वचन, और इस्राएल को अपनी विधियाँ और नियम बताता है। |
| 20 | किसी और जाति से उस ने ऐसा बर्ताव नहीं किया; और उसके नियमों को औरों ने नहीं जाना। याह की स्तुति करो! |