| 1 | दाऊद का भजन हे यहोवा, जो मेरे साथ मुक़द्दमा लड़ते हैं, उनके साथ तू भी मुक़द्दमा लड़; जो मुझ से युद्ध करते हैं, उनसे तू युद्ध कर। |
| 2 | ढाल और भाला लेकर मेरी सहायता करने को खड़ा हो। |
| 3 | बर्छी को खींच और मेरा पीछा करनेवालों के सामने आकर उनको रोक; और मुझ से कह, कि मैं तेरा उद्धार हूँ। |
| 4 | जो मेरे प्राण के ग्राहक हैं वे लज्जित और निरादर हों! जो मेरी हानि की कल्पना करते हैं, वे पीछे हटाए जाएँ और उनका मुँह काला हो! |
| 5 | वे वायु से उड़ जानेवाली भूसी के समान हों, और यहोवा का दूत उन्हें हाँकता जाए! |
| 6 | उनका मार्ग अन्धियारा और फिसलन भरा हो, और यहोवा का दूत उनको खदेड़ता जाए। |
| 7 | क्योंकि अकारण उन्होंने मेरे लिये अपना जाल गड़हे में बिछाया; अकारण ही उन्होंने मेरा प्राण लेने के लिये गड़हा खोदा है। |
| 8 | अचानक उन पर विपत्ति आ पड़े! और जो जाल उन्होंने बिछाया है उसी में वे आप ही फँसें; और उसी विपत्ति में वे आप ही पड़ें। |
| 9 | परन्तु मैं यहोवा के कारण अपने मन में मगन होऊँगा, मैं उसके किए हुए उद्धार से हर्षित होऊँगा। |
| 10 | मेरी हड्डी हड्डी कहेगी, “हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है, जो दीन को बड़े बड़े बलवन्तों से बचाता है, और लुटेरों से दीन दरिद्र लोगों की रक्षा करता है?” |
| 11 | झूठे साक्षी खड़े होते हैं; और जो बात मैं नहीं जानता, वही मुझ से पूछते हैं। |
| 12 | वे मुझ से भलाई के बदले बुराई करते हैं, यहाँ तक कि मेरा प्राण ऊब जाता है। |
| 13 | जब वे रोगी थे तब तो मैं टाट पहिने रहा, और उपवास कर करके दु:ख उठाता रहा; और मेरी प्रार्थना का फल मेरी गोद में लौट आया। |
| 14 | मैं ऐसी भावना रखता था कि मानो वे मेरे संगी या भाई हैं; जैसा कोई माता के लिये विलाप करता हो, वैसा ही मैं ने शोक का पहिरावा पहिने हुए सिर झुकाकर शोक किया। |
| 15 | परन्तु जब मैं लँगड़ाने लगा तब वे लोग आनन्दित होकर इकट्ठे हुए, नीच लोग और जिन्हें मैं जानता भी न था वे मेरे विरुद्ध इकट्ठे हुए; वे मुझे लगातार फाड़ते रहे, |
| 16 | उन पाखण्डी भाँड़ों के समान जो पेट के लिये उपहास करते हैं, वे भी मुझ पर दाँत पीसते हैं। |
| 17 | हे प्रभु, तू कब तक देखता रहेगा? इस विपत्ति से, जिस में उन्होंने मुझे डाला है मुझ को छुड़ा। जवान सिहों से मेरे प्राण को बचा ले! |
| 18 | मैं बड़ी सभा में तेरा धन्यवाद करूँगा; बहुतेरे लोगों के बीच मैं तेरी स्तुति करूँगा। |
| 19 | मेरे झूठ बोलनेवाले शत्रु मेरे विरुद्ध आनन्द न करने पाएँ, जो अकारण मेरे बैरी हैं, वे आपस में नैन से सैन न करने पाएँ। |
| 20 | क्योंकि वे मेल की बातें नहीं बोलते, परन्तु देश में जो शान्तिपूर्वक रहते हैं, उनके विरुद्ध छल की कल्पनाएँ करते हैं। |
| 21 | उन्होंने मेरे विरुद्ध मुँह पसारके कहा; “आहा, आहा, हमने अपनी आँखों से देखा है!” |
| 22 | हे यहोवा, तू ने तो देखा है; चुप न रह! हे प्रभु, मुझ से दूर न रह! |
| 23 | उठ, मेरे न्याय के लिये जाग, हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे प्रभु, मेरा मुक़द्दमा निपटाने के लिये आ! |
| 24 | हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू अपने धर्म के अनुसार मेरा न्याय चुका; और उन्हें मेरे विरुद्ध आनन्द करने न दे! |
| 25 | वे मन में न कहने पाएँ, “आहा! हमारी तो इच्छा पूरी हुई!” वे यह न कहें, “हम उसे निगल गए हैं।” |
| 26 | जो मेरी हानि से आनन्दित होते हैं उनके मुँह लज्जा के मारे एक साथ काले हों! जो मेरे विरुद्ध बड़ाई मारते हैं वे लज्जा और अनादर से ढँप जाएँ! |
| 27 | जो मेरे धर्म से प्रसन्न रहते हैं, वे जयजयकार और आनन्द करें, और निरन्तर कहते रहें, यहोवा की बड़ाई हो, जो अपने दास के कुशल से प्रसन्न होता है! |
| 28 | तब मेरे मुँह से तेरे धर्म की चर्चा होगी, और दिन भर तेरी स्तुति निकलेगी। |