| 1 | प्रधान बजानेवाले के लिये शोशन्नीम राग में दाऊद का गीत हे परमेश्वर, मेरा उद्धार कर, मैं जल में डूबा जाता हूँ। |
| 2 | मैं बड़े दलदल में धँसा जाता हूँ, और मेरे पैर कहीं नहीं रुकते; मैं गहिरे जल में आ गया, और धारा में डूबा जाता हूँ। |
| 3 | मैं पुकारते पुकारते थक गया, मेरा गला सूख गया है; अपने परमेश्वर की बाट जोहते जोहते, मेरी आँखें धुँधली पड़ गई हैं। |
| 4 | जो अकारण मेरे बैरी हैं, वे गिनती में मेरे सिर के बालों से अधिक हैं; मेरे विनाश करनेवाले जो व्यर्थ मेरे शत्रु हैं, वे सामर्थी हैं, इसलिये जो मैं ने लूटा नहीं वह भी मुझ को देना पड़ा। |
| 5 | हे परमेश्वर, तू तो मेरी मूढ़ता को जानता है, और मेरे दोष तुझ से छिपे नहीं हैं। |
| 6 | हे प्रभु, हे सेनाओं के यहोवा, जो तेरी बाट जोहते हैं, उनकी आशा मेरे कारण न टूटे; हे इस्राएल के परमेश्वर, जो तुझे ढूँढ़ते हैं, उनका मुँह मेरे कारण काला न हो। |
| 7 | तेरे ही कारण मेरी निन्दा हुई है, और मेरा मुँह लज्जा से ढँपा है। |
| 8 | मैं अपने भाइयों के सामने अजनबी हुआ, और अपने सगे भाइयों की दृष्टि में परदेशी ठहरा हूँ। |
| 9 | क्योंकि मैं तेरे भवन की धुन में जलते जलते भस्म हुआ। और जो निन्दा वे तेरी करते हैं, वही निन्दा मुझ को सहनी पड़ी है। |
| 10 | जब मैं रोकर और उपवास करके दु:ख उठाता था, तब उससे भी मेरी नामधराई ही हुई। |
| 11 | जब मैं टाट का वस्त्र पहिने था, तब मेरा दृष्टान्त उन में चलता था। |
| 12 | फाटक के पास बैठनेवाले मेरे विषय बातचीत करते हैं, और मदिरा पीनेवाले मुझ पर लगता हुआ गीत गाते हैं। |
| 13 | परन्तु हे यहोवा, मेरी प्रार्थना तो तेरी प्रसन्नता के समय में हो रही है; हे परमेश्वर, अपनी करुणा की बहुतायत से, और बचाने की अपनी सच्ची प्रतिज्ञा के अनुसार मेरी सुन ले। |
| 14 | मुझ को दलदल में से उबार कि मैं धँस न जाऊँ; मैं अपने बैरियों से, और गहिरे जल में से बच जाऊँ। |
| 15 | मैं धारा में डूब न जाऊँ, और न मैं गहिरे जल में डूब मरूँ, और न पाताल का मुँह मेरे ऊपर बन्द हो। |
| 16 | हे यहोवा, मेरी सुन ले, क्योंकि तेरी करुणा उत्तम है; अपनी दया की बहुतायत के अनुसार मेरी ओर ध्यान दे। |
| 17 | अपने दास से अपना मुँह न मोड़; क्योंकि मैं संकट में हूँ, फुर्ती से मेरी सुन ले। |
| 18 | मेरे निकट आकर मुझे छुड़ा ले, मेरे शत्रुओं से मुझ को छुटकारा दे। |
| 19 | मेरी नामधराई और लज्जा और अनादर को तू जानता है: मेरे सब द्रोही तेरे सामने हैं। |
| 20 | मेरा हृदय नामधराई के कारण फट गया, और मैं बहुत उदास हूँ। मैं ने किसी तरस खानेवाले की आशा तो की, परन्तु किसी को न पाया, और शान्ति देनेवाले को ढूँढ़ता तो रहा, परन्तु कोई न मिला। |
| 21 | लोगों ने मेरे खाने के लिये इन्द्रायन दिया, और मेरी प्यास बुझाने के लिये मुझे सिरका पिलाया। |
| 22 | उनका भोजन उनके लिये फन्दा हो जाए; और उनके सुख के समय जाल बन जाए। |
| 23 | उनकी आँखों पर अन्धेरा छा जाए, ताकि वे देख न सकें; और तू उनकी कटि को निरन्तर कँपाता रह। |
| 24 | उनके ऊपर अपना रोष भड़का, और तेरे क्रोध की आँच उनको लगे। |
| 25 | उनकी छावनी उजड़ जाए, उनके डेरों में कोई न रहे। |
| 26 | क्योंकि जिसको तू ने मारा, वे उसके पीछे पड़े हैं, और जिनको तू ने घायल किया, वे उनकी पीड़ा की चर्चा करते हैं। |
| 27 | उनके अधर्म पर अधर्म बढ़ा; और वे तेरे धर्म को प्राप्त न करें। |
| 28 | उनका नाम जीवन की पुस्तक में से काटा जाए, और धर्मियों के संग लिखा न जाए। |
| 29 | परन्तु मैं तो दु:खी और पीड़ित हूँ, इसलिये हे परमेश्वर, तू मेरा उद्धार करके मुझे ऊँचे स्थान पर बैठा। |
| 30 | मैं गीत गाकर तेरे नाम की स्तुति करूँगा, और धन्यवाद करता हुआ तेरी बड़ाई करूँगा। |
| 31 | यह यहोवा को बैल से अधिक, वरन् सींग और खुरवाले बैल से भी अधिक भाएगा। |
| 32 | नम्र लोग इसे देखकर आनन्दित होंगे, हे परमेश्वर के खोजियो, तुम्हारा मन हरा हो जाए। |
| 33 | क्योंकि यहोवा दरिद्रों की ओर कान लगाता, और अपने लोगों को जो बन्दी हैं तुच्छ नहीं जानता। |
| 34 | स्वर्ग और पृथ्वी उसकी स्तुति करें, और समुद्र अपने सब जीव जन्तुओं समेत उसकी स्तुति करे। |
| 35 | क्योंकि परमेश्वर सिय्योन का उद्धार करेगा, और यहूदा के नगरों को फिर बसाएगा; और लोग फिर वहाँ बसकर उसके अधिकारी हो जाएँगे। |
| 36 | उसके दासों का वंश उसको अपने भाग में पाएगा, और उसके नाम के प्रेमी उस में वास करेंगे। |