| 1 | जो परमप्रधान के छाए हुए स्थान में बैठा रहे, वह सर्वशक्तिमान की छाया में ठिकाना पाएगा। |
| 2 | मैं यहोवा के विषय कहूँगा, “वह मेरा शरणस्थान और गढ़ है; वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूँगा।” |
| 3 | वह तुझे बहेलिये के जाल से, और महामारी से बचाएगा; |
| 4 | वह तुझे अपने पंखों की आड़ में ले लेगा, और तू उसके परों के नीचे शरण पाएगा, उसकी सच्चाई तेरे लिये ढाल और झिलम ठहरेगी। |
| 5 | तू न रात के भय से डरेगा, और न उस तीर से जो दिन को उड़ता है, |
| 6 | न उस मरी से जो अन्धेरे में फैलती है, और न उस महारोग से जो दिन-दुपहरी में उजाड़ता है। |
| 7 | तेरे निकट हज़ार, और तेरी दाहिनी ओर दस हज़ार गिरेंगे; परन्तु वह तेरे पास न आएगा। |
| 8 | परन्तु तू अपनी आँखों से दृष्टि करेगा और दुष्टों के अन्त को देखेगा। |
| 9 | हे यहोवा, तू मेरा शरणस्थान ठहरा है। तू ने जो परमप्रधान को अपना धाम मान लिया है, |
| 10 | इसलिये कोई विपत्ति तुझ पर न पड़ेगी, न कोई दु:ख तेरे डेरे के निकट आएगा। |
| 11 | क्योंकि वह अपने दूतों को तेरे निमित्त आज्ञा देगा, कि जहाँ कहीं तू जाए वे तेरी रक्षा करें। |
| 12 | वे तुझ को हाथों हाथ उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे। |
| 13 | तू सिंह और नाग को कुचलेगा, तू जवान सिंह और अजगर को लताड़ेगा। |
| 14 | उसने जो मुझ से स्नेह किया है, इसलिये मैं उसको छुड़ाऊँगा, मैं उसको ऊँचे स्थान पर रखूँगा, क्योंकि उसने मेरे नाम को जान लिया है। |
| 15 | जब वह मुझ को पुकारे, तब मैं उसकी सुनूँगा, संकट में मैं उसके संग रहूँगा, मैं उसको बचाकर उसकी महिमा बढ़ाऊँगा। |
| 16 | मैं उसको दीर्घायु से तृप्त करूँगा, और अपने किए हुए उद्धार का दर्शन दिखाऊँगा। |