| 1 | हे यहोवा, हमारी नहीं, हमारी नहीं, वरन् अपने ही नाम की महिमा, अपनी करुणा और सच्चाई के निमित्त कर। |
| 2 | जाति जाति के लोग क्यों कहने पाएँ, “उनका परमेश्वर कहाँ रहा?” |
| 3 | हमारा परमेश्वर तो स्वर्ग में है; उसने जो चाहा वही किया है। |
| 4 | उन लोगों की मूरतें सोने चाँदी ही की तो हैं, वे मनुष्यों के हाथ की बनाई हुई हैं। |
| 5 | उनके मुँह तो रहता है, परन्तु वे बोल नहीं सकतीं; उनके आँखें तो रहती हैं, परन्तु वे देख नहीं सकतीं। |
| 6 | उनके कान तो रहते हैं, परन्तु वे सुन नहीं सकतीं; उनके नाक तो रहती है, परन्तु वे सूँघ नहीं सकतीं, |
| 7 | उनके हाथ तो रहते हैं; परन्तु वे स्पर्श नहीं कर सकतीं; उनके पाँव तो रहते हैं, परन्तु वे चल नहीं सकतीं; और अपने कण्ठ से कुछ भी शब्द नहीं निकाल सकतीं। |
| 8 | जैसी वे हैं वैसे ही उनके बनानेवाले हैं; और उन पर सब भरोसा रखनेवाले भी वैसे ही हो जाएँगे। |
| 9 | हे इस्राएल, यहोवा पर भरोसा रख! तेरा सहायक और ढाल वही है। |
| 10 | हे हारून के घराने, यहोवा पर भरोसा रख! तेरा* सहायक और ढाल वही है। |
| 11 | हे यहोवा के डरवैयो, यहोवा पर भरोसा रखो! तुम्हारा* सहायक और ढाल वही है। |
| 12 | यहोवा ने हम को स्मरण किया है; वह आशीष देगा; वह इस्राएल के घराने को आशीष देगा; वह हारून के घराने को आशीष देगा। |
| 13 | क्या छोटे क्या बड़े जितने यहोवा के डरवैये हैं, वह उन्हें आशीष देगा। |
| 14 | यहोवा तुम को और तुम्हारे लड़कों को भी अधिक बढ़ाता जाए! |
| 15 | यहोवा जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है, उसकी ओर से तुम आशीष पाए हो। |
| 16 | स्वर्ग तो यहोवा का है, परन्तु पृथ्वी उसने मनुष्यों को दी है। |
| 17 | मृतक जितने चुपचाप पड़े हैं, वे तो याह की स्तुति नहीं कर सकते, |
| 18 | परन्तु हम लोग याह को अब से लेकर सर्वदा तक धन्य कहते रहेंगे। याह की स्तुति करो! |