| 1 | मैं प्रेम रखता हूँ, इसलिये कि यहोवा ने मेरे गिड़गिड़ाने को सुना है। |
| 2 | उसने जो मेरी ओर कान लगाया है, इसलिये मैं जीवन भर उसको पुकारा करूँगा। |
| 3 | मृत्यु की रस्सियाँ मेरे चारों ओर थीं; मैं अधोलोक की सकेती में पड़ा था; मुझे संकट और शोक भोगना पड़ा। |
| 4 | तब मैं ने यहोवा से प्रार्थना की, “हे यहोवा, विनती सुनकर मेरे प्राण को बचा ले!” |
| 5 | यहोवा अनुग्रहकारी और धर्मी है; और हमारा परमेश्वर दया करनेवाला है। |
| 6 | यहोवा भोलों की रक्षा करता है; जब मैं बलहीन हो गया था, उसने मेरा उद्धार किया। |
| 7 | हे मेरे प्राण, तू अपने विश्रामस्थान में लौट आ; क्योंकि यहोवा ने तेरा उपकार किया है। |
| 8 | तू ने तो मेरे प्राण को मृत्यु से, मेरी आँख को आँसू बहाने से, और मेरे पाँव को ठोकर खाने से बचाया है। |
| 9 | मैं जीवित रहते हुए, अपने को यहोवा के सामने जानकर नित चलता रहूँगा। |
| 10 | मैं ने जो ऐसा कहा है, इसे विश्वास की कसौटी पर कस कर कहा है, “मैं तो बहुत ही दु:खित हूँ;” |
| 11 | मैं ने उतावली से कहा, “सब मनुष्य झूठे हैं।” |
| 12 | यहोवा ने मेरे जितने उपकार किए हैं, उनका बदला मैं उसको क्या दूँ? |
| 13 | मैं उद्धार का कटोरा उठाकर, यहोवा से प्रार्थना करूँगा, |
| 14 | मैं यहोवा के लिये अपनी मन्नतें सभों की दृष्टि में प्रगट रूप में उसकी सारी प्रजा के सामने पूरी करूँगा। |
| 15 | यहोवा के भक्तों की मृत्यु, उसकी दृष्टि में अनमोल है। |
| 16 | हे यहोवा, सुन, मैं तो तेरा दास हूँ; मैं तेरा दास, और तेरी दासी का पुत्र हूँ। तू ने मेरे बन्धन खोल दिए हैं। |
| 17 | मैं तुझ को धन्यवादबलि चढ़ाऊँगा, और यहोवा से प्रार्थना करूँगा। |
| 18 | मैं यहोवा के लिये अपनी मन्नतें, प्रगट में उसकी सारी प्रजा के सामने |
| 19 | यहोवा के भवन के आँगनों में, हे यरूशलेम, तेरे भीतर पूरी करूँगा। याह की स्तुति करो! |