| 1 | आलेफ क्या ही धन्य हैं वे जो चाल के खरे हैं, और यहोवा की व्यवस्था पर चलते हैं! |
| 2 | क्या ही धन्य हैं वे जो उसकी चितौनियों को मानते हैं! और पूर्ण मन से उसके पास आते हैं! |
| 3 | फिर वे कुटिलता का काम नहीं करते, वे उसके मार्गों में चलते हैं। |
| 4 | तू ने अपने उपदेश इसलिये दिए हैं, कि वे यत्न से माने जाएँ। |
| 5 | भला होता कि तेरी विधियों को मानने के लिये मेरी चालचलन दृढ़ हो जाए! |
| 6 | तब मैं तेरी सब आज्ञाओं की ओर चित्त लगाए रहूँगा, और मेरी आशा न टूटेगी। |
| 7 | जब मैं तेरे धर्ममय नियमों को सीखूँगा, तब तेरा धन्यवाद सीधे मन से करूँगा। |
| 8 | मैं तेरी विधियों को मानूँगा: मुझे पूरी रीति से न तज! बेथ |
| 9 | जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से। |
| 10 | मैं पूरे मन से तेरी खोज में लगा हूँ; मुझे तेरी आज्ञाओं की बाट से भटकने न दे! |
| 11 | मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ। |
| 12 | हे यहोवा, तू धन्य है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा! |
| 13 | तेरे सब कहे हुए नियमों का वर्णन, मैं ने अपने मुँह से किया है। |
| 14 | मैं तेरी चितौनियों के मार्ग से, मानो सब प्रकार के धन से हर्षित हुआ हूँ। |
| 15 | मैं तेरे उपदेशों पर ध्यान करूँगा, और तेरे मार्गों की ओर दृष्टि रखूँगा। |
| 16 | मैं तेरी विधियों से सुख पाऊँगा; और तेरे वचन को न भूलूँगा। गिमेल |
| 17 | अपने दास का उपकार कर कि मैं जीवित रहूँ, और तेरे वचन पर चलता रहूँ। |
| 18 | मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ। |
| 19 | मैं तो पृथ्वी पर परदेशी हूँ; अपनी आज्ञाओं को मुझ से छिपाए न रख! |
| 20 | मेरा मन तेरे नियमों की अभिलाषा के कारण हर समय खेदित रहता है। |
| 21 | तू ने अभिमानियों को, जो शापित हैं, घुड़का है, वे तेरी आज्ञाओं से भटके हुए हैं। |
| 22 | मेरी नामधराई और अपमान दूर कर, क्योंकि मैं तेरी चितौनियों को पकड़े हूँ। |
| 23 | हाकिम भी बैठे हुए आपस में मेरे विरुद्ध बातें करते थे, परन्तु तेरा दास तेरी विधियों पर ध्यान करता रहा। |
| 24 | तेरी चितौनियाँ मेरा सुखमूल और मेरे मंत्री हैं। दाल्थ |
| 25 | मैं धूल में पड़ा हूँ; तू अपने वचन के अनुसार मुझ को जिला! |
| 26 | मैं ने अपनी चालचलन का तुझ से वर्णन किया है और तू ने मेरी बात मान ली है; तू मुझ को अपनी विधियाँ सिखा! |
| 27 | अपने उपदेशों का मार्ग मुझे बता, तब मैं तेरे आश्चर्यकर्मों पर ध्यान करूँगा। |
| 28 | मेरा जीव उदासी के मारे गल चला है; तू अपने वचन के अनुसार मुझे सम्भाल! |
| 29 | मुझ को झूठ के मार्ग से दूर कर; और करुणा करके अपनी व्यवस्था मुझे दे। |
| 30 | मैं ने सच्चाई का मार्ग चुन लिया है, तेरे नियमों की ओर मैं चित्त लगाए रहता हूँ। |
| 31 | मैं तेरी चितौनियों में लवलीन हूँ, हे यहोवा, मेरी आशा न तोड़! |
| 32 | जब तू मेरा हियाव बढ़ाएगा, तब मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग में दौड़ूँगा। हे |
| 33 | हे यहोवा, मुझे अपनी विधियों का मार्ग दिखा दे; तब मैं उसे अन्त तक पकड़े रहूँगा। |
| 34 | मुझे समझ दे, तब मैं तेरी व्यवस्था को पकड़े रहूँगा। और पूर्ण मन से उस पर चलूँगा। |
| 35 | अपनी आज्ञाओं के पथ में मुझ को चला, क्योंकि मैं उसी से प्रसन्न हूँ। |
| 36 | मेरे मन को लोभ की ओर नहीं, अपनी चितौनियों ही की ओर फेर दे। |
| 37 | मेरी आँखों को व्यर्थ वस्तुओं की ओर से फेर दे; तू अपने मार्ग में मुझे जिला। |
| 38 | तेरा वचन जो तेरे भय माननेवालों के लिये है, उसको अपने दास के निमित्त भी पूरा कर। |
| 39 | जिस नामधराई से मैं डरता हूँ, उसे दूर कर; क्योंकि तेरे नियम उत्तम हैं। |
| 40 | देख, मैं तेरे उपदेशों का अभिलाषी हूँ; अपने धर्म के कारण मुझ को जिला। वाव |
| 41 | हे यहोवा, तेरी करुणा और तेरा किया हुआ उद्धार, तेरे वचन के अनुसार, मुझ को भी मिले; |
| 42 | तब मैं अपनी नामधराई करनेवालों को कुछ उत्तर दे सकूँगा, क्योंकि मेरा भरोसा, तेरे वचन पर है। |
| 43 | मुझे अपने सत्य वचन कहने से न रोक क्योंकि मेरी आशा तेरे नियमों पर है। |
| 44 | तब मैं तेरी व्यवस्था पर लगातार, सदा सर्वदा चलता रहूँगा; |
| 45 | और मैं चौड़े स्थान में चला फिरा करूँगा, क्योंकि मैं ने तेरे उपदेशों की सुधि रखी है। |
| 46 | और मैं तेरी चितौनियों की चर्चा राजाओं के सामने भी करूँगा, और संकोच न करूँगा; |
| 47 | क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं के कारण सुखी हूँ, और मैं उनसे प्रीति रखता हूँ। |
| 48 | मैं तेरी आज्ञाओं की ओर जिनसे मैं प्रीति रखता हूँ, हाथ फैलाऊँगा, और तेरी विधियों पर ध्यान करूँगा। ज़ैन |
| 49 | जो वचन तू ने अपने दास को दिया है, उसे स्मरण कर, क्योंकि तू ने मुझे आशा दी है। |
| 50 | मेरे दु:ख में मुझे शान्ति उसी से हुई है, क्योंकि तेरे वचन के द्वारा मैं ने जीवन पाया है। |
| 51 | अभिमानियों ने मुझे अत्यन्त ठट्ठे में उड़ाया है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था से नहीं हटा। |
| 52 | हे यहोवा, मैं ने तेरे प्राचीन नियमों को स्मरण करके शान्ति पाई है। |
| 53 | जो दुष्ट तेरी व्यवस्था को छोड़े हुए हैं, उनके कारण मैं सन्ताप से जलता हूँ। |
| 54 | जहाँ मैं परदेशी होकर रहता हूँ, वहाँ तेरी विधियाँ, मेरे गीत गाने का विषय बनी हैं। |
| 55 | हे यहोवा, मैं ने रात को तेरा नाम स्मरण किया, और तेरी व्यवस्था पर चला हूँ। |
| 56 | यह मुझ से इस कारण हुआ, कि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए था। ख़ेथ |
| 57 | यहोवा मेरा भाग है; मैं ने तेरे वचनों के अनुसार चलने का निश्चय किया है। |
| 58 | मैं ने पूरे मन से तुझे मनाया है; इसलिये अपने वचन के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर। |
| 59 | मैं ने अपनी चालचलन को सोचा, और तेरी चितौनियों का मार्ग लिया। |
| 60 | मैं ने तेरी आज्ञाओं को मानने में विलम्ब नहीं, फुर्ती की है। |
| 61 | मैं दुष्टों की रस्सियों से बन्ध गया हूँ। तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूला। |
| 62 | तेरे धर्ममय नियमों के कारण मैं आधी रात को तेरा धन्यवाद करने को उठूँगा। |
| 63 | जितने तेरा भय मानते और तेरे उपदेशों पर चलते हैं, उनका मैं संगी हूँ। |
| 64 | हे यहोवा, तेरी करुणा पृथ्वी में भरी हुई है; तू मुझे अपनी विधियाँ सिखा! टेथ |
| 65 | हे यहोवा, तू ने अपने वचन के अनुसार अपने दास के संग भलाई की है। |
| 66 | मुझे भली विवेक-शक्ति और ज्ञान दे, क्योंकि मैं ने तेरी आज्ञाओं का विश्वास किया है। |
| 67 | उससे पहले कि मैं दु:खित हुआ, मैं भटकता था; परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ। |
| 68 | तू भला है, और भला करता भी है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा। |
| 69 | अभिमानियों ने तो मेरे विरुद्ध झूठ बात गढ़ी है, परन्तु मैं तेरे उपदेशों को पूरे मन से पकड़े रहूँगा। |
| 70 | उनका मन मोटा हो गया है, परन्तु मैं तेरी व्यवस्था के कारण सुखी हूँ। |
| 71 | मुझे जो दु:ख हुआ वह मेरे लिये भला ही हुआ है, जिससे मैं तेरी विधियों को सीख सकूँ। |
| 72 | तेरी दी हुई व्यवस्था मेरे लिये हज़ारों रुपयों और मुहरों से भी उत्तम है। योध |
| 73 | तेरे हाथों से मैं बनाया और रचा गया हूँ; मुझे समझ दे कि मैं तेरी आज्ञाओं को सीखूँ। |
| 74 | तेरे डरवैये मुझे देखकर आनन्दित होंगे, क्योंकि मैं ने तेरे वचन पर आशा लगाई है। |
| 75 | हे यहोवा, मैं जान गया कि तेरे नियम धर्ममय हैं, और तू ने अपनी सच्चाई के अनुसार मुझे दु:ख दिया है। |
| 76 | मुझे अपनी करुणा से शान्ति दे, क्योंकि तू ने अपने दास को ऐसा ही वचन दिया है। |
| 77 | तेरी दया मुझ पर हो, तब मैं जीवित रहूँगा; क्योंकि मैं तेरी व्यवस्था से सुखी हूँ। |
| 78 | अभिमानियों की आशा टूटे, क्योंकि उन्होंने मुझे झूठ के द्वारा गिरा दिया है; परन्तु मैं तेरे उपदेशों पर ध्यान करूँगा। |
| 79 | जो तेरा भय मानते हैं, वे मेरी ओर फिरें, तब वे तेरी चितौनियों को समझ लेंगे। |
| 80 | मेरा मन तेरी विधियों के मानने में सिद्ध हो, ऐसा न हो कि मुझे लज्जित होना पड़े। क़ाफ |
| 81 | मेरा प्राण तेरे उद्धार के लिये बेचैन है; परन्तु मुझे तेरे वचन पर आशा रहती है। |
| 82 | मेरी आँखें तेरे वचन के पूरे होने की बाट जोहते जोहते धुँधली पड़ गई हैं; और मैं कहता हूँ कि तू मुझे कब शान्ति देगा? |
| 83 | क्योंकि मैं धूएँ में की कुप्पी के समान हो गया हूँ, तौभी तेरी विधियों को नहीं भूला। |
| 84 | तेरे दास के कितने दिन रह गए हैं? तू मेरे पीछे पड़े हुओं को दण्ड कब देगा? |
| 85 | अभिमानी जो तेरी व्यवस्था के अनुसार नहीं चलते, उन्होंने मेरे लिये गड़हे खोदे हैं। |
| 86 | तेरी सब आज्ञाएँ विश्वासयोग्य हैं; वे लोग झूठ बोलते हुए मेरे पीछे पड़े हैं; तू मेरी सहायता कर! |
| 87 | वे मुझ को पृथ्वी पर से मिटा डालने ही पर थे, परन्तु मैं ने तेरे उपदेशों को नहीं छोड़ा। |
| 88 | अपनी करुणा के अनुसार मुझ को जिला, तब मैं तेरी दी हुई चितौनी को मानूँगा। लामेध |
| 89 | हे यहोवा, तेरा वचन, आकाश में सदा तक स्थिर रहता है। |
| 90 | तेरी सच्चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है; तू ने पृथ्वी को स्थिर किया, इसलिये वह बनी है। |
| 91 | वे आज के दिन तक तेरे नियमों के अनुसार ठहरे हैं; क्योंकि सारी सृष्टि तेरे अधीन है। |
| 92 | यदि मैं तेरी व्यवस्था से सुखी न होता, तो मैं दु:ख के समय नष्ट हो जाता। |
| 93 | मैं तेरे उपदेशों को कभी न भूलूँगा; क्योंकि उन्हीं के द्वारा तू ने मुझे जिलाया है। |
| 94 | मैं तेरा ही हूँ, तू मेरा उद्धार कर; क्योंकि मैं तेरे उपदेशों की सुधि रखता हूँ। |
| 95 | दुष्ट मेरा नाश करने के लिये मेरी घात में लगे हैं; परन्तु मैं तेरी चितौनियों पर ध्यान करता हूँ। |
| 96 | जितनी बातें पूरी जान पड़ती हैं, उन सब को तो मैं ने अधूरी पाया है, परन्तु तेरी आज्ञा का विस्तार बड़ा है। मीम |
| 97 | आहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूँ! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है। |
| 98 | तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं। |
| 99 | मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूँ, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है। |
| 100 | मैं पुरनियों से भी समझदार हूँ, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूँ। |
| 101 | मैं ने अपने पाँवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिससे मैं तेरे वचन के अनुसार चलूँ। |
| 102 | मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है। |
| 103 | तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुँह में मधु से भी मीठे हैं! |
| 104 | तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूँ, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूँ। नून |
| 105 | तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है। |
| 106 | मैं ने शपथ खाई, और ठान लिया है, कि मैं तेरे धर्ममय नियमों के अनुसार चलूँगा। |
| 107 | मैं अत्यन्त दु:ख में पड़ा हूँ; हे यहोवा, अपने वचन के अनुसार मुझे जिला। |
| 108 | हे यहोवा, मेरे वचनों को स्वेच्छाबलि जानकर ग्रहण कर, और अपने नियमों को मुझे सिखा। |
| 109 | मेरा प्राण निरन्तर मेरी हथेली पर रहता है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को भूल नहीं गया। |
| 110 | दुष्टों ने मेरे लिये फन्दा लगाया है, परन्तु मैं तेरे उपदेशों के मार्ग से नहीं भटका। |
| 111 | मैं ने तेरी चितौनियों को सदा के लिये अपना निज भाग कर लिया है, क्योंकि वे मेरे हृदय के हर्ष का कारण हैं। |
| 112 | मैं ने अपने मन को इस बात पर लगाया है, कि अन्त तक तेरी विधियों पर सदा चलता रहूँ। सामेख |
| 113 | मैं दुचित्तों से तो बैर रखता हूँ, परन्तु तेरी व्यवस्था से प्रीति रखता हूँ। |
| 114 | तू मेरी आड़ और ढाल है; मेरी आशा तेरे वचन पर है। |
| 115 | हे कुकर्मियो, मुझ से दूर हो जाओ, कि मैं अपने परमेश्वर की आज्ञाओं को पकड़े रहूँ! |
| 116 | हे यहोवा, अपने वचन के अनुसार मुझे सम्भाल, कि मैं जीवित रहूँ, और मेरी आशा को न तोड़! |
| 117 | मुझे थामे रख, तब मैं बचा रहूँगा, और निरन्तर तेरी विधियों की ओर चित्त लगाए रहूँगा! |
| 118 | जितने तेरी विधियों के मार्ग से भटक जाते हैं, उन सब को तू तुच्छ जानता है, क्योंकि उनकी चतुराई झूठ है। |
| 119 | तू ने पृथ्वी के सब दुष्टों को धातु के मैल के समान दूर किया है; इस कारण मैं तेरी चितौनियों से प्रीति रखता हूँ। |
| 120 | तेरे भय से मेरा शरीर काँप उठता है, और मैं तेरे नियमों से डरता हूँ। ऐन |
| 121 | मैं ने तो न्याय और धर्म का काम किया है; तू मुझे अन्धेर करनेवालों के हाथ में न छोड़। |
| 122 | अपने दास की भलाई के लिये जामिन हो, ताकि अभिमानी मुझ पर अन्धेर न करने पाएँ। |
| 123 | मेरी आँखें तुझ से उद्धार पाने, और तेरे धर्ममय वचन के पूरे होने की बाट जोहते जोहते धुँधली पड़ गई हैं। |
| 124 | अपने दास के संग अपनी करुणा के अनुसार बर्ताव कर, और अपनी विधियाँ मुझे सिखा। |
| 125 | मैं तेरा दास हूँ, तू मुझे समझ दे कि मैं तेरी चितौनियों को समझूँ। |
| 126 | वह समय आया है, कि यहोवा काम करे, क्योंकि लोगों ने तेरी व्यवस्था को तोड़ दिया है। |
| 127 | इस कारण मैं तेरी आज्ञाओं को सोने से वरन् कुन्दन से भी अधिक प्रिय मानता हूँ। |
| 128 | इसी कारण मैं तेरे सब उपदेशों को सब विषयों में ठीक जानता हूँ; और सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूँ। पे |
| 129 | तेरी चितौनियाँ अनूप हैं, इस कारण मैं उन्हें अपने जी से लगाए हुए हूँ। |
| 130 | तेरी बातों के खुलने से प्रकाश होता है; उससे भोले लोग समझ प्राप्त करते हैं। |
| 131 | मैं मुँह खोलकर हाँफने लगा, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं का प्यासा था। |
| 132 | जैसी तेरी रीति अपने नाम की प्रीति रखनेवालों से है, वैसे ही मेरी ओर भी फिरकर मुझ पर अनुग्रह कर। |
| 133 | मेरे पैरों को अपने वचन के मार्ग पर स्थिर कर, और किसी अनर्थ बात को मुझ पर प्रभुता न करने दे। |
| 134 | मुझे मनुष्यों के अन्धेर से छुड़ा ले, तब मैं तेरे उपदेशों को मानूँगा। |
| 135 | अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका दे, और अपनी विधियाँ मुझे सिखा। |
| 136 | मेरी आँखों से जल की धारा बहती रहती है, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते। सांदे |
| 137 | हे यहोवा तू धर्मी है, और तेरे नियम सीधे हैं। |
| 138 | तू ने अपनी चितौनियों को धर्म और पूरी सत्यता से कहा है। |
| 139 | मैं तेरी धुन में भस्म हो रहा हूँ, क्योंकि मेरे सतानेवाले तेरे वचनों को भूल गए हैं। |
| 140 | तेरा वचन पूरी रीति से ताया हुआ है, इसलिये तेरा दास उस से प्रीति रखता है। |
| 141 | मैं छोटा और तुच्छ हूँ, तौभी मैं तेरे उपदेशों को नहीं भूलता। |
| 142 | तेरा धर्म सदा का धर्म है, और तेरी व्यवस्था सत्य है। |
| 143 | मैं संकट और सकेती में फँसा हूँ, परन्तु मैं तेरी आज्ञाओं से सुखी हूँ। |
| 144 | तेरी चितौनियाँ सदा धर्ममय हैं; तू मुझ को समझ दे कि मैं जीवित रहूँ। क़ाफ़ |
| 145 | मैं ने सारे मन से प्रार्थना की है, हे यहोवा मेरी सुन लेना! मैं तेरी विधियों को पकड़े रहूँगा। |
| 146 | मैं ने तुझ से प्रार्थना की है, तू मेरा उद्धार कर, और मैं तेरी चितौनियों को माना करूँगा। |
| 147 | मैं ने पौ फटने से पहले दोहाई दी; मेरी आशा तेरे वचनों पर थी। |
| 148 | मेरी आँखें रात के एक एक पहर से पहले खुल गईं, कि मैं तेरे वचन पर ध्यान करूँ। |
| 149 | अपनी करुणा के अनुसार मेरी सुन ले; हे यहोवा, अपनी रीति के अनुसार मुझे जीवित कर। |
| 150 | जो दुष्टता की धुन में हैं, वे निकट आ गए हैं; वे तेरी व्यवस्था से दूर हैं। |
| 151 | हे यहोवा, तू निकट है, और तेरी सब आज्ञाएँ सत्य हैं। |
| 152 | बहुत समय से मैं तेरी चितौनियों को जानता हूँ, कि तू ने उनकी नींव सदा के लिये डाली है। रेश |
| 153 | मेरे दु:ख को देखकर मुझे छुड़ा ले, क्योंकि मैं तेरी व्यवस्था को भूल नहीं गया। |
| 154 | मेरा मुक़द्दमा लड़, और मुझे छुड़ा ले; अपने वचन के अनुसार मुझ को जिला। |
| 155 | दुष्टों को उद्धार मिलना कठिन है, क्योंकि वे तेरी विधियों की सुधि नहीं रखते। |
| 156 | हे यहोवा, तेरी दया तो बड़ी है; इसलिये अपने नियमों के अनुसार मुझे जिला। |
| 157 | मेरा पीछा करनेवाले और मेरे सतानेवाले बहुत हैं, परन्तु मैं तेरी चितौनियों से नहीं हटता। |
| 158 | मैं विश्वासघातियों को देखकर उदास हुआ, क्योंकि वे तेरे वचन को नहीं मानते। |
| 159 | देख, मैं तेरे नियमों से कैसी प्रीति रखता हूँ! हे यहोवा, अपनी करुणा के अनुसार मुझ को जिला। |
| 160 | तेरा सारा वचन सत्य ही है; और तेरा एक एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है। शीन |
| 161 | हाकिम व्यर्थ मेरे पीछे पड़े हैं, परन्तु मेरा हृदय तेरे वचनों का भय मानता है। |
| 162 | जैसे कोई बड़ी लूट पाकर हर्षित होता है, वैसे ही मैं तेरे वचन के कारण हर्षित हूँ। |
| 163 | झूठ से तो मैं बैर और घृणा रखता हूँ, परन्तु तेरी व्यवस्था से प्रीति रखता हूँ। |
| 164 | तेरे धर्ममय नियमों के कारण मैं प्रतिदिन सात बार तेरी स्तुति करता हूँ। |
| 165 | तेरी व्यवस्था से प्रीति रखनेवालों को बड़ी शान्ति होती है; और उनको कुछ ठोकर नहीं लगती। |
| 166 | हे यहोवा, मैं तुझ से उद्धार पाने की आशा रखता हूँ, और तेरी आज्ञाओं पर चलता आया हूँ। |
| 167 | मैं तेरी चितौनियों को जी से मानता हूँ, और उनसे बहुत प्रीति रखता आया हूँ। |
| 168 | मैं तेरे उपदेशों और चितौनियों को मानता आया हूँ, क्योंकि मेरी सारी चालचलन तेरे सम्मुख प्रगट है। ताव |
| 169 | हे यहोवा, मेरी दोहाई तुझ तक पहुँचे; तू अपने वचन के अनुसार मुझे समझ दे! |
| 170 | मेरा गिड़गिड़ाना तुझ तक पहुँचे; तू अपने वचन के अनुसार मुझे छुड़ा ले। |
| 171 | मेरे मुँह से स्तुति निकला करे, क्योंकि तू मुझे अपनी विधियाँ सिखाता है। |
| 172 | मैं तेरे वचन का गीत गाऊँगा, क्योंकि तेरी सब आज्ञाएँ धर्ममय हैं। |
| 173 | तेरा हाथ मेरी सहायता करने को तैयार रहता है, क्योंकि मैं ने तेरे उपदेशों को अपनाया है। |
| 174 | हे यहोवा, मैं तुझ से उद्धार पाने की अभिलाषा करता हूँ, मैं तेरी व्यवस्था से सुखी हूँ। |
| 175 | मुझे जिला, और मैं तेरी स्तुति करूँगा, तेरे नियमों से मेरी सहायता हो। |
| 176 | मैं खोई हुई भेड़ के समान भटका हूँ; तू अपने दास को ढूँढ़ ले, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं को भूल नहीं गया। |