| 1 | तब शूही बिलदद ने कहा, |
| 2 | “तू कब तक ऐसी ऐसी बातें करता रहेगा, और तेरे मुँह की बातें कब तक प्रचण्ड वायु सी रहेंगी? |
| 3 | क्या परमेश्वर अन्याय करता है? और क्या सर्वशक्तिमान धर्म को उलटा करता है? |
| 4 | यदि तेरे बच्चों ने उसके विरुद्ध पाप किया है, तो उसने उनको उनके अपराध का फल भुगताया है। |
| 5 | तौभी यदि तू आप परमेश्वर को यत्न से ढूँढ़ता, और सर्वशक्तिमान से गिड़गिड़ाकर विनती करता, |
| 6 | और यदि तू निर्मल और धर्मी रहता, तो निश्चय वह तेरे लिये जागता; और तेरी धार्मिकता का निवास फिर ज्यों का त्यों कर देता। |
| 7 | चाहे तेरा भाग पहले छोटा ही रहा हो, परन्तु अन्त में तेरी बहुत बढ़ती होती। |
| 8 | “पिछली पीढ़ी के लोगों से तो पूछ, और जो कुछ उनके पुरखाओं ने जाँच पड़ताल की है उस पर ध्यान दे; |
| 9 | क्योंकि हम तो कल ही के हैं, और कुछ नहीं जानते; और पृथ्वी पर हमारे दिन छाया के समान बीतते जाते हैं। |
| 10 | क्या वे लोग तुझ से शिक्षा की बातें न कहेंगे? क्या वे अपने मन से बात न निकालेंगे? |
| 11 | “क्या कछार की घास पानी बिना बढ़ सकती है? क्या सरकण्डा जल बिना बढ़ता है? |
| 12 | चाहे वह हरी हो, और काटी भी न गई हो, तौभी वह और सब भाँति की घास से पहले ही सूख जाती है। |
| 13 | परमेश्वर के सब बिसरानेवालों की गति ऐसी ही होती है और भक्तिहीन की आशा टूट जाती है। |
| 14 | उसकी आशा का मूल कट जाता है; और जिसका वह भरोसा करता है, वह मकड़ी का जाला ठहरता है। |
| 15 | चाहे वह अपने घर पर भरोसा रखे परन्तु वह न ठहरेगा; वह उसे दृढ़ता से थामेगा परन्तु वह स्थिर न रहेगा। |
| 16 | वह धूप पाकर हरा भरा हो जाता है, और उसकी डालियाँ बगीचे में चारों ओर फैलती हैं। |
| 17 | उसकी जड़ कंकरों के ढेर में लिपटी हुई रहती है, और वह पत्थर के स्थान को देख लेता है। |
| 18 | परन्तु जब वह अपने स्थान पर से नष्ट किया जाए, तब वह स्थान उससे यह कहकर मुँह मोड़ लेगा, ‘मैं ने तुझे कभी देखा ही नहीं।’ |
| 19 | देख, उसकी आनन्द भरी चाल यही है; फिर उसी मिट्टी में से दूसरे उगेंगे। |
| 20 | “देख, परमेश्वर न तो खरे मनुष्य को निकम्मा जानकर छोड़ देता है, और न बुराई करनेवालों को संभालता है। |
| 21 | वह तो तुझे हँसमुख करेगा; और तुझ से जयजयकार कराएगा। |
| 22 | तेरे बैरी लज्जा का वस्त्र पहिनेंगे, और दुष्टों का डेरा कहीं रहने न पाएगा।” |