| 1 | “सर्वशक्तिमान ने समय क्यों नहीं ठहराया, और जो लोग उसका ज्ञान रखते हैं वे उसके दिन क्यों देखने नहीं पाते? |
| 2 | कुछ लोग भूमि की सीमा को बढ़ाते, और भेड़ बकरियाँ छीनकर चराते हैं। |
| 3 | वे अनाथों का गदहा हाँक ले जाते, और विधवा का बैल बन्धक रखते हैं। |
| 4 | वे दरिद्र लोगों को मार्ग से हटा देते, और देश के दीनों को इकट्ठे छिपना पड़ता है। |
| 5 | देखो, वे जंगली गदहों के समान अपने काम को और कुछ भोजन यत्न से ढूँढ़ने को निकल जाते हैं; उनके बाल-बच्चों का भोजन उनको जंगल से मिलता है। |
| 6 | उनको खेत में चारा काटना, और दुष्टों की बची बचाई दाख बटोरना पड़ता है। |
| 7 | रात को उन्हें बिना वस्त्र नंगे पड़े रहना, और जाड़े के समय बिना ओढ़े पड़े रहना पड़ता है। |
| 8 | वे पहाड़ों पर की वर्षा से भीगे रहते, और शरण न पाकर चट्टान से लिपट जाते हैं। |
| 9 | कुछ लोग अनाथ बालक को माँ की छाती पर से छीन लेते हैं, और दीन लोगों से बन्धक लेते हैं। |
| 10 | जिस से वे बिना वस्त्र नंगे फिरते हैं; और भूख के मारे, पूलियाँ ढोते हैं। |
| 11 | वे उनकी दीवारों के भीतर तेल पेरते और उनके कुण्डों में दाख रौंदते हुए भी प्यासे रहते हैं। |
| 12 | वे बड़े नगर में कराहते हैं, और घायल किए हुओं का जी दोहाई देता है; परन्तु परमेश्वर मूर्खता का हिसाब नहीं लेता। |
| 13 | “कुछ लोग उजियाले से बैर रखते, वे उसके मार्गों को नहीं पहचानते, और न उसके मार्गों में बने रहते हैं। |
| 14 | हत्यारा पौ फटते ही उठकर दीन दरिद्र मनुष्य को घात करता, और रात को चोर बन जाता है। |
| 15 | व्यभिचारी यह सोचकर कि कोई मुझ को देखने न पाए, दिन डूबने की राह देखता रहता है, और वह अपना मुँह छिपाए भी रखता है। |
| 16 | वे अन्धियारे के समय घरों में सेंध मारते और दिन को छिपे रहते हैं; वे उजियाले को जानते भी नहीं। |
| 17 | इसलिये उन सभों को भोर का प्रकाश घोर अन्धकार सा जान पड़ता है, क्योंकि घोर अन्धकार के भय से वे मित्रता रखते हैं।” |
| 18 | “वे जल के ऊपर हलकी वस्तु के सरीखे हैं, उनके भाग को पृथ्वी के रहनेवाले कोसते हैं, और वे अपनी दाख की बारियों में लौटने नहीं पाते। |
| 19 | जैसे सूखे और धूप से हिम का जल सूख जाता है वैसे ही पापी लोग अधोलोक में सूख जाते हैं। |
| 20 | माता भी उसको भूल जाती, और कीड़े उसे चूसते हैं, भविष्य में उसका स्मरण न रहेगा; इस रीति टेढ़ा काम करनेवाला वृक्ष के समान कट जाता है। |
| 21 | “वह बाँझ स्त्री को जो कभी नहीं जनी लूटता, और विधवा से भलाई करना नहीं चाहता है। |
| 22 | बलात्कारियों को भी परमेश्वर अपनी शक्ति से खींच लेता है, जो जीवित रहने की आशा नहीं रखता, वह भी फिर उठ बैठता है। |
| 23 | वह उन्हें ऐसे बेखटके कर देता है, कि वे सम्भले रहते हैं; और उसकी कृपादृष्टि उनकी चाल पर लगी रहती है। |
| 24 | वे थोड़ी देर के लिये बढ़ते हैं, तब जाते रहते हैं, वे दबाए जाते और सभों के समान रख लिये जाते हैं, और अनाज की बाल के समान काटे जाते हैं। |
| 25 | क्या यह सब सच नहीं! कौन मुझे झुठलाएगा? कौन मेरी बातें निकम्मी ठहराएगा?” |