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फिर एलीहू इस प्रकार और भी कहता गया,
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“क्या तू इसे अपना हक़ समझता है? क्या तू दावा करता है कि तेरा धर्म परमेश्वर के धर्म से अधिक है?
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जो तू कहता है, ‘मुझे इस से क्या लाभ? मुझे पापी होने में और न होने में कौन सा अधिक अन्तर है?’
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मैं तुझे और तेरे साथियों को भी एक संग उत्तर देता हूँ।
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आकाश की ओर दृष्टि करके देख; और आकाशमण्डल को ताक, जो तुझ से ऊँचा है।
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यदि तू ने पाप किया है तो परमेश्वर का क्या बिगड़ता है? यदि तेरे अपराध बहुत बढ़ जाएँ तौभी तू उसका क्या कर लेगा?
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यदि तू धर्मी है तो उसको क्या दे देता है; या उसे तेरे हाथ से क्या मिल जाता है?
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तेरी दुष्टता का फल तुझ जैसे पुरुष के लिये है, और तेरे धर्म का फल भी मनुष्य मात्र के लिये है।
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9
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“बहुत अन्धेर होने के कारण वे चिल्लाते हैं; और बलवान के बाहुबल के कारण वे दोहाई देते हैं।
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तौभी कोई यह नहीं कहता, ‘मेरा सृजनेवाला परमेश्वर कहाँ है, जो रात में भी गीत गवाता है;
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जो हमें पृथ्वी के पशुओं से अधिक शिक्षा देता, और आकाश के पक्षियों से अधिक बुद्धि देता है?’
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वे दोहाई देते हैं परन्तु कोई उत्तर नहीं देता, यह बुरे लोगों के घमण्ड के कारण होता है।
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13
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निश्चय परमेश्वर व्यर्थ बातें कभी नहीं सुनता, और न सर्वशक्तिमान उन पर चित्त लगाता है।
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14
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तो तू क्यों कहता है, कि वह मुझे दर्शन नहीं देता, कि यह मुक़द्दमा उसके सामने है, और तू उसकी बाट जोहता हुआ ठहरा है?
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परन्तु अभी तो उसने क्रोध करके दण्ड नहीं दिया है, और अभिमान पर चित्त बहुत नहीं लगाया;
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16
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इस कारण अय्यूब व्यर्थ मुँह खोलकर अज्ञानता की बातें बहुत बनाता है।”
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