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1
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तब अय्यूब ने कहा,
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“निर्बल जन की तू ने कितनी बड़ी सहायता की, और जिसकी बाँह में सामर्थ्य नहीं, उसको तू ने कैसे सम्भाला है?
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3
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निर्बुद्धि मनुष्य को तू ने कितनी अच्छी सम्मति दी, और अपनी खरी बुद्धि कैसी भली भाँति प्रगट की है?
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4
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तू ने किसके हित के लिये बातें कहीं? और किसके मन की बातें तेरे मुँह से निकलीं?”
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5
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“बहुत दिन के मरे हुए लोग भी जलनिधि और उसके निवासियों के तले तड़पते हैं।
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6
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अधोलोक उसके सामने उघड़ा रहता है, और विनाश का स्थान ढक नहीं सकता।
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7
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वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है।
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8
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वह जल को अपनी काली घटाओं में बाँध रखता, और बादल उसके बोझ से नहीं फटता।
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9
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वह अपने सिंहासन के सामने बादल फैलाकर उसको छिपाए रखता है।
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10
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उजियाले और अन्धियारे के बीच जहाँ सीमा बँधी है, वहाँ तक उसने जलनिधि की सीमा ठहरा रखी है।
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11
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उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथराकर चकित होते हैं।
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12
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वह अपने बल से समुद्र को शान्त करता, और अपनी बुद्धि से रहब को छेद देता है।
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13
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उसकी श्वास से आकाशमण्डल स्वच्छ हो जाता है, वह अपने हाथ से वेग भागनेवाले नाग को मार देता है।
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14
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देखो, ये तो उसकी गति के किनारे ही हैं; और उसकी आहट फुसफुसाहट ही सी तो सुन पड़ती है, फिर उसके पराक्रम के गरजने का भेद कौन समझ सकता है?”
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