| 1 | फिर इस्राएल के कुछ पुरनिये मेरे पास आकर मेरे सामने बैठ गए। |
| 2 | तब यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा, |
| 3 | “हे मनुष्य के सन्तान, इन पुरुषों ने तो अपनी मूरतें अपने मन में स्थापित कीं, और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखी है; फिर क्या वे मुझ से कुछ भी पूछने पाएँगे? |
| 4 | इसलिये तू उन से कह, प्रभु यहोवा यों कहता है: इस्राएल के घराने में से जो कोई अपनी मूरतें अपने मन में स्थापित करके, और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखकर भविष्यद्वक्ता के पास आए, उसको मैं यहोवा, उसकी बहुत सी मूरतों के अनुसार ही उत्तर दूँगा, |
| 5 | जिस से इस्राएल का घराना, जो अपनी मूरतों के द्वारा मुझे त्यागकर दूर हो गया है, उन्हें मैं उन्हीं के मन के द्वारा फँसाऊँगा। |
| 6 | “इसलिये इस्राएल के घराने से कह, प्रभु यहोवा यों कहता है: फिरो और अपनी मूरतों को पीठ के पीछे करो; और अपने सब घृणित कामों से मुँह मोड़ो। |
| 7 | क्योंकि इस्राएल के घराने में से और उसके बीच रहनेवाले परदेशियों में से भी कोई क्यों न हो, जो मेरे पीछे हो लेना छोड़कर अपनी मूरतें अपने मन में स्थापित करे, और अपने अधर्म की ठोकर अपने सामने रखे, और तब मुझ से अपनी कोई बात पूछने के लिए भविष्यद्वक्ता के पास आए, तो उसको मैं यहोवा आप ही उत्तर दूँगा। |
| 8 | मैं उस मनुष्य के विरुद्ध होकर उसको विस्मित करूँगा, और चिह्न ठहराऊँगा; और उसकी कहावत चलाऊँगा और उसे अपनी प्रजा में से नष्ट करूँगा; तब तुम लोग जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ। |
| 9 | यदि भविष्यद्वक्ता ने धोखा खाकर कोई वचन कहा हो, तो जानो कि मुझ यहोवा ने उस भविष्यद्वक्ता को धोखा दिया है; और मैं अपना हाथ उसके विरुद्ध बढ़ाकर उसे अपनी प्रजा इस्राएल में से नष्ट करूँगा। |
| 10 | वे सब लोग अपने अपने अधर्म का बोझ उठाएँगे, अर्थात् जैसा भविष्यद्वक्ता से पूछनेवाले का अधर्म ठहरेगा, वैसा ही भविष्यद्वक्ता का भी अधर्म ठहरेगा। |
| 11 | ताकि इस्राएल का घराना आगे को मेरे पीछे हो लेना न छोड़े और न अपने भाँति भाँति के अपराधों के द्वारा आगे को अशुद्ध बने; वरन् वे मेरी प्रजा बनें और मैं उनका परमेश्वर ठहरूँ, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।” |
| 12 | तब यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा, |
| 13 | “हे मनुष्य के सन्तान, जब किसी देश के लोग मुझ से विश्वासघात करके पापी हो जाएँ, और मैं अपना हाथ उस देश के विरुद्ध बढ़ाकर उसका अन्नरूपी आधार दूर करूँ, और उसमें अकाल डालकर उसमें से मनुष्य और पशु दोनों का नाश करूँ, |
| 14 | तब चाहे उस में नूह, दानिय्येल, और अय्यूब ये तीनों पुरुष हों, तौभी वे अपने धर्म के द्वारा केवल अपने ही प्राणों को बचा सकेंगे; प्रभु यहोवा की यही वाणी है। |
| 15 | यदि मैं किसी देश में दुष्ट जन्तु भेजूँ जो उसको निर्जन करके उजाड़ डालें, और जन्तुओं के कारण कोई उसमें होकर न जाए, |
| 16 | तो चाहे उसमें वे तीन पुरुष हों, तौभी प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, न वे पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, वे ही अकेले बचेंगे; परन्तु देश उजाड़ हो जाएगा। |
| 17 | यदि मैं उस देश पर तलवार खींचकर कहूँ, ‘हे तलवार उस देश में चल;’ और इस रीति मैं उस में से मनुष्य और पशु नष्ट करूँ, |
| 18 | तब चाहे उसमें वे तीन पुरुष भी हों, तौभी प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, न तो वे पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, वे ही अकेले बचेंगे। |
| 19 | यदि मैं उस देश में मरी फैलाऊँ और उस पर अपनी जलजलाहट भड़काकर उसका लहू ऐसा बहाऊँ कि वहाँ के मनुष्य और पशु दोनों नष्ट हों, |
| 20 | तो चाहे नूह, दानिय्येल और अय्यूब भी उसमें हों, तौभी, प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मेरे जीवन की सौगन्ध, वे न पुत्रों को और न पुत्रियों को बचा सकेंगे, अपने धर्म के द्वारा वे केवल अपने ही प्राणों को बचा सकेंगे। |
| 21 | “क्योंकि प्रभु यहोवा यों कहता है: मैं यरूशलेम पर अपने चारों दण्ड पहुँचाऊँगा, अर्थात् तलवार, अकाल, दुष्ट जन्तु और मरी, जिनसे मनुष्य और पशु सब उसमें से नष्ट हों। |
| 22 | तौभी उसमें थोड़े से पुत्र-पुत्रियाँ बचेंगी जो वहाँ से निकालकर तुम्हारे पास पहुँचाई जाएँगी, और तुम उनके चालचलन और कामों को देखकर उस विपत्ति के विषय में जो मैं यरूशलेम पर डालूँगा, वरन् जितनी विपत्ति मैं उस पर डालूँगा, उस सब के विषय में शान्ति पाओगे। |
| 23 | जब तुम उनका चालचलन और काम देखो, तब वे तुम्हारी शान्ति के कारण होंगे; और तुम जान लोगे कि मैं ने यरूशलेम में जो कुछ किया, वह बिना कारण नहीं किया, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।” |