| 1 | क्योंकि व्यवस्था, जिसमें आनेवाली अच्छी वस्तुओं का प्रतिबिम्ब है पर उनका असली स्वरूप नहीं, इसलिये उन एक ही प्रकार के बलिदानों के द्वारा जो प्रतिवर्ष अचूक चढ़ाए जाते हैं, पास आनेवालों को कदापि सिद्ध नहीं कर सकती। |
| 2 | नहीं तो उनका चढ़ाना बन्द क्यों न हो जाता? इसलिये जब सेवा करनेवाले एक ही बार शुद्ध हो जाते, तो फिर उनका विवेक उन्हें पापी न ठहराता। |
| 3 | परन्तु उनके द्वारा प्रति वर्ष पापों का स्मरण हुआ करता है। |
| 4 | क्योंकि यह अनहोना है कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे। |
| 5 | इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, “बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार की। |
| 6 | होमबलियों और पापबलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ। |
| 7 | तब मैं ने कहा, ‘देख, मैं आ गया हूँ, पवित्रशास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है, ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।” |
| 8 | ऊपर तो वह कहता है, “न तू ने बलिदान और भेंट और होमबलियों और पापबलियों को चाहा, और न उनसे प्रसन्न हुआ,” यद्यपि ये बलिदान तो व्यवस्था के अनुसार चढ़ाए जाते हैं। |
| 9 | फिर यह भी कहता है, “देख, मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ,” अत: वह पहले को उठा देता है, ताकि दूसरे को नियुक्त करे। |
| 10 | उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। |
| 11 | हर एक याजक तो खड़े होकर प्रतिदिन सेवा करता है, और एक ही प्रकार के बलिदान को जो पापों को कभी भी दूर नहीं कर सकते, बार-बार चढ़ाता है। |
| 12 | परन्तु यह व्यक्ति तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाकर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा, |
| 13 | और उसी समय से इसकी बाट जोह रहा है, कि उसके बैरी उसके पाँवों के नीचे की पीढ़ी बनें। |
| 14 | क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। |
| 15 | और पवित्र आत्मा भी हमें यही गवाही देता है; क्योंकि उसने पहले कहा था, |
| 16 | “प्रभु कहता है कि जो वाचा मैं उन दिनों के बाद उनसे बाँधूँगा वह यह है कि मैं अपने नियमों को उनके हृदय पर लिखूँगा और मैं उनके विवेक में डालूँगा।” |
| 17 | फिर वह यह कहता है, “मैं उनके पापों को और उनके अधर्म के कामों को फिर कभी स्मरण न करूँगा।” |
| 18 | और जब इनकी क्षमा हो गई है, तो फिर पाप का बलिदान नहीं रहा। |
| 19 | इसलिये हे भाइयो, जब हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, |
| 20 | जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर, हमारे लिये अभिषेक किया है, |
| 21 | और इसलिये कि हमारा ऐसा महान् याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है, |
| 22 | तो आओ, हम सच्चे मन और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिये हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएँ। |
| 23 | आओ हम अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें, क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की है, वह सच्चा है; |
| 24 | और प्रेम, और भले कामों में उस्काने के लिये हम एक दूसरे की चिन्ता किया करें, |
| 25 | और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो। |
| 26 | क्योंकि सच्चाई की पहिचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। |
| 27 | हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा। |
| 28 | जब मूसा की व्यवस्था का न माननेवाला, दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है, |
| 29 | तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा, जिसने परमेश्वर के पुत्र को पाँवों से रौंदा और वाचा के लहू को, जिसके द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह के आत्मा का अपमान किया। |
| 30 | क्योंकि हम उसे जानते हैं, जिसने कहा, “पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा।” और फिर यह, कि “प्रभु अपने लोगों का न्याय करेगा।” |
| 31 | जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है। |
| 32 | परन्तु उन पिछले दिनों को स्मरण करो, जिन में तुम ज्योति पाकर दु:खों के बड़े संघर्ष में स्थिर रहे। |
| 33 | कभी-कभी तो यों कि तुम निन्दा और क्लेश सहते हुए तमाशा बने, और कभी यों कि तुम उनके साझी हुए जिनकी दुर्दशा की जाती थी। |
| 34 | क्योंकि तुम कैदियों के दु:ख में भी दु:खी हुए, और अपनी संपत्ति भी आनन्द से लुटने दी; यह जानकर कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरनेवाली संपत्ति है। |
| 35 | इसलिये अपना हियाव न छोड़ो क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है। |
| 36 | क्योंकि तुम्हें धीरज धरना आवश्यक है, ताकि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ। |
| 37 | “क्योंकि अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है, जब कि आनेवाला आएगा और देर न करेगा। |
| 38 | पर मेरा धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा, और यदि वह पीछे हट जाए तो मेरा मन उस से प्रसन्न न होगा।” |
| 39 | पर हम हटनेवाले नहीं कि नाश हो जाएँ पर विश्वास करनेवाले हैं कि प्राणों को बचाएँ। |