| 1 | हे यहोवा, स्मरण कर कि हम पर क्या क्या बीता है; हमारी ओर दृष्टि करके हमारी नामधराई को देख! |
| 2 | हमारा भाग परदेशियों का हो गया और हमारे घर परायों के हो गए हैं। |
| 3 | हम अनाथ और पिताहीन हो गए; हमारी माताएँ विधवा-सी हो गई हैं। |
| 4 | हम मोल लेकर पानी पीते हैं, हम को लकड़ी भी दाम से मिलती है। |
| 5 | खदेड़नेवाले हमारी गर्दन पर टूट पड़े हैं; हम थक गए हैं, हमें विश्राम नहीं मिलता। |
| 6 | हम स्वयं मिस्र के अधीन हो गए, और अश्शूर के भी, ताकि पेट भर सकें। |
| 7 | हमारे पुरखाओं ने पाप किया, और मर मिटे हैं; परन्तु उनके अधर्म के कामों का भार हम को उठाना पड़ा है। |
| 8 | हमारे ऊपर दास अधिकार रखते हैं; उनके हाथ से कोई हमें नहीं छुड़ाता। |
| 9 | जंगल में की तलवार के कारण हम अपने प्राण जोखिम में डालकर भोजनवस्तु ले आते हैं। |
| 10 | भूख की झुलसाने वाली आग के कारण, हमारा चमड़ा तंदूर के समान काला हो गया है। |
| 11 | सिय्योन में स्त्रियाँ, और यहूदा के नगरों में कुमारियाँ भ्रष्ट की गईं हैं। |
| 12 | हाकिम हाथ के बल टाँगे गए हैं; और पुरनियों का कुछ भी आदर नहीं किया गया। |
| 13 | जवानों को चक्की चलानी पड़ती है; और बाल-बच्चे लकड़ी का बोझ उठाते हुए लडखड़ाते हैं। |
| 14 | अब फाटक पर पुरनिये नहीं बैठते, न जवानों का गीत सुनाई पड़ता है। |
| 15 | हमारे मन का हर्ष जाता रहा, हमारा नाचना विलाप में बदल गया है। |
| 16 | हमारे सिर पर का मुकुट गिर पड़ा है; हम पर हाय, क्योंकि हम ने पाप किया है! |
| 17 | इस कारण हमारा हृदय निर्बल हो गया है, इन्हीं बातों से हमारी आँखें धुँधली पड़ गई हैं, |
| 18 | क्योंकि सिय्योन पर्वत उजाड़ पड़ा है; उसमें सियार घूमते हैं। |
| 19 | परन्तु हे यहोवा, तू तो सदा तक विराजमान रहेगा; तेरा राज्य पीढ़ी-पीढ़ी बना रहेगा। |
| 20 | तू ने क्यों हम को सदा के लिये भुला दिया है, और क्यों बहुत काल के लिये हमें छोड़ दिया है? |
| 21 | हे यहोवा, हम को अपनी ओर फेर, तब हम फिर सुधर जाएँगे। प्राचीनकाल के समान हमारे दिन बदलकर ज्यों के त्यों कर दे! |
| 22 | क्या तू ने हमें बिल्कुल त्याग दिया है? क्या तू हम से अत्यन्त क्रोधित है? |